Sampurna vidur niti: विदुर के अनमोल वचन,विदुर नीति इन हिंदी

Sampurna vidur niti: vidur niti mahabharat के समय की एक प्रकार की निति है जो राज काज में होने बाले परीवर्तन को लेकर विदुर के अनुसार जो मोल अनमोल विचार कहे गए उन्हें vidur niti katha या विदुर नीति श्लोक,विदुर की नीति कहते जिन्हें में आज आपको बताने बाला हूँ इसमें आपको नीति श्लोक अर्थ सहित,विदुर नीति pdf भी मिलेगी जिसे आप अपने कंप्यूटर या मोबाइल में डालकर पढ़ सकते हैं|
Sampurna vidur niti:

Sampurna vidur niti: विदुर के अनमोल वचन,विदुर नीति इन हिंदी

वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ में दिए गए सूत्र और प्रसंग आज भी श्रेष्ठ जीवन के लिए प्रेरणा देते हैं। वैसे तो महाभारत में कई महान पात्र हैं, इन महान पात्रों में एक पात्र ऐसा है जो दासी का पुत्र था। दासी पुत्र होते हुए भी महाभारत में इस पात्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह दासी पुत्र है कौरवों के महामंत्री विदुर।

विदुर एक दासी के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने अपनी नीतियों के बल पर इतिहास में श्रेष्ठ स्थान हासिल किया है। महामंत्री विदुर ने विदुर नीति नामक एक ग्रंथ की रचना भी की है। इस ग्रंथ में दी गई नीतियां आज भी हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। विदुर को यमराज का अवतार माना जाता है।

Sampurna vidur niti: विदुर के अनमोल वचन

सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से सुन्दर रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है, तोलने से अनाज की रक्षा होती है, हाथ फेरने से घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की तथा मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है.
जो धातु बिना गर्म किये मुड जाती है, उसे आग में नहीं तपाते. जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकाने का प्रयत्न नहीं करता, अतः बुद्धिमान पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये.
ऐसे पुरूषों को अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं
जो अपने आश्रित जनों को बांटकर खाता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा मांगने पर जो मित्र नहीं है, उसे भी धन देता है.
जो अपने बराबर वालों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत रखता है, हीन पुरूषों के साथ नहीं, और गुणों में बढे़ पुरूषों को सदा आगे रखता है, उस विद्धान की नीति श्रेष्ठ है.
जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कार्य, प्रायश्चित तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार-इन कार्यो को नित्य करता है, देवगण उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं.
जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु से बुद्धि पूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है.
राजा को निम्न सात दोषों को त्याग देना चाहिये
स्त्रीविषयक आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दंड देना और धन का दुरुपयोग करना.
द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा.
गृहस्थश्च निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः
जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते. गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है.
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सुर्यमण्डलभेदिनौ .
परिव्राड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥

ये दो प्रकार के पुरुष सूर्यमंडल को भी भेद कर सर्वोच्च गति को प्राप्त करते हैं : 1. योगयुक्त सन्यासी
2. वीरगति को प्राप्त योद्धा.
न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ .
अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ॥ सही तरह से कमाए गए धन के दो ही दुरुपयोग हो सकते हैं : 1. अपात्र को दिया जाना 2. सत्पात्र को न दिया जाना
द्वाविमौ पुरुषौ राजन्स्वर्गस्य परि तिष्ठतः . प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥ ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाते हैं : 1. शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला | 2. गरीब होकर भी दान करने वाला.
द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषणौ . यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः ॥ ये दो आदतें नुकीले कांटे की तरह शरीर को बेध देती है: 1. गरीब होकर भी कीमती वस्तुओं की इच्छा रखना | 2. कमजोर होकर भी गुस्सा करना.
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र परप्रत्यय कारिणौ . स्त्रियः कामित कामिन्यो लोकः पूजित पूजकः ॥ 2 प्रकार के लोग दूसरों पर विश्वास करके चलते हैं, इनकी अपनी कोई इच्छाशक्ति नहीं होती है : 1. दूसरी स्त्री द्वारा चाहे गए पुरुष की कामना करने वाली स्त्रियाँ | 2. दूसरों द्वारा पूजे गए व्यक्ति की पूजा करने वाले लोग
द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिँल्लोके विरोचते . अब्रुवन्परुषं किं चिदसतो नार्थयंस्तथा ॥ इन दो कर्मों को करनेवाला मनुष्य इस लोक में विशेष शोभा पाता है : 1. बिल्कुल भी कठोर न बोलने वाला | 2. बुरे लोगों का आदर नहीं करने वाला
द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव . राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ बिल में रहने वाले जीवों को जैसे सांप खा जाता है, उसी प्रकार शत्रु से डटकर मुकाबला न करने वाले शासक और परदेश न जाने वाले ब्राह्मण – इन दोनों को पृथ्वी खा जाती है.
ये 8 गुण ख्याति बढ़ाते हैं : बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान देना और कृतज्ञता.
ये 6 सुख हैं : नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेलजोल रखना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना.
6 प्रकार के मनुष्य हमेशा दुखी रहते हैं: ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, शक करने वाला और दूसरों के सहारे जीवन निर्वाह करने वाला.
ये लोग धर्म नहीं जानते : नशे में धूत, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लालची, डरा हुआ व्यक्ति और कामी.
1 (यानि बुद्धि) से 2 (यानि कर्त्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके 4 (यानि साम, दाम, दंड और भेद) से 3 (यानी मित्र, शत्रु और उदासीन) को वश में कीजिये। 5 इन्द्रियों को जीतकर 6 (यानि संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, समश्रयरूप) गुणों को जान कर तथा 7 (यानि स्त्री, जुआ, शिकार, मद्य, कठोर वचन, दंड की कठोरता और अन्याय से धन का उपार्जन) को छोड़ कर सुखी हो जाईये।
दो प्रकार के लोग दूसरों पर विश्वास करके चलते हैं, इनकी अपनी कोई इच्छाशक्ति नहीं होती है। दूसरी स्त्री द्वारा चाहे गए पुरुष की कामना करने वाली स्त्रियाँ, दूसरों द्वारा पूजे गए व्यक्ति की पूजा करने वाले लोग।
दो प्रकार के लोग दूसरों पर विश्वास करके चलते हैं, इनकी अपनी कोई इच्छाशक्ति नहीं होती है। दूसरी स्त्री द्वारा चाहे गए पुरुष की कामना करने वाली स्त्रियाँ, दूसरों द्वारा पूजे गए व्यक्ति की पूजा करने वाले लोग।
अत्यंत अहंकार, अधिक बोलना, त्याग न करना, क्रोध करना, केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में रहना तथा मित्रों से द्रोह करना। ये छह दुर्गुण मनुष्य की आयु का क्षरण करते हैं। दुर्गुण वाले मनुष्य को मृत्यु नहीं बल्कि अपने कर्मो के परिणाम ही मारते हैं।
अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग, दुःख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता – ये गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ करने से नहीं रोक पाते, वही बुद्धिमान या पंडित कहलाता है।
अल्पमात्रा में धन होते हुए भी कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और कांटों के समान है।
उस विद्धान की नीति श्रेष्ठ है जो अपने बराबर वालों के साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत रखता है, हीन पुरूषों के साथ नहीं, और गुणों में बढे़ चढ़े पुरूषों को सदा आगे रखता है, उस विद्धान की नीति श्रेष्ठ है।
ऐसे पुरूषों को अनर्थ दूर से ही छोड़ देते हैं-जो अपने आश्रित जनों को बांटकर खाता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा मांगने पर जो मित्र नहीं है, उसे भी धन देता है।
कटु वचन रूपी बाण से आहत मनुष्य रात-दिन घुलता रहता है।
कभी कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिये तैयार हो जाते हैं और हमें बाद में दुःख भी होता है। अतः इसलिये विशेष अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।
किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है, किसी एक को भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।
किसी प्रयोजन से किये गए कर्मों में पहले प्रयोजन को समझ लेना चाहिए। खूब सोच-विचार कर काम करना चाहिए, जल्दबाजी से किसी काम का आरम्भ नहीं करना चाहिए। Vidur Niti Hindi:
केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दंडता, तथा स्वयं को पूज्य समझना – ये भाव जिस व्यक्ति को पुरुषार्थ के मार्ग से नहीं भटकाते वही बुद्धिमान या पंडित कहलाता है।
क्षमा को दोष नहीं मानना चाहिए, निश्चय ही क्षमा परम बल है। क्षमा निर्बल मनुष्यों का गुण है और बलवानों का क्षमा-भूषण है।
जब ये चार बातें होती हैं तो व्यक्ति की नींद उड़ जाती है, 1- काम भावना जाग जाने पर 2- खुद से अधिक बलवान व्यक्ति से दुश्मनी हो जाने पर 3- यदि किसी से सब कुछ छीन लिया जाए 4- किसी को चोरी की आदत पड़ जाए।
जिस कार्य को करने के बाद में पछताना पड़े, उसे किया ही क्यों जाए? जब हमें मालूम है कि क्षणभंगुर है तो इतनी हाय-माया क्यों?
जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन करना पड़े, शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
जिस व्यकित के कर्मों में न ही सर्दी और न ही गर्मी, न ही भय और न ही अनुराग, न ही संपत्ति और न ही दरिद्रता विघ्न डाल पाते हैं वही पण्डित कहलाता है।
जिस व्यक्ति का निर्णय और बुद्धि धर्मं का अनुशरण करती है और जो भोग विलास ओ त्याग कर पुरुषार्थ को चुनता है वही पण्डित कहलाता है।
जिस व्यक्ति की विद्या या ज्ञान उसके बुद्धि का अनुशरण करती है और बुद्धि उसके ज्ञान का तथा जो भद्र पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता वही पण्डित की पदवी पा सकता है। Vidur Niti Hindi:
जिस व्यक्ति के कर्त्तव्य, सलाह और पहले से लिए गए निर्णय को केवल काम संपन्न होने पर ही दुसरे लोग जान पाते हैं, वही पंडित कहलाता है। Vidur Niti Hindi:
जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है, उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं। Vidur Niti Hindi:
जो अपना आदर-सम्मान होने पर ख़ुशी से फूल नहीं उठता, और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगाजी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।। Vidur Niti Hindi:
जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी नहीं शोभा पाते। गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और सन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है।
जो कभी उद्यंडका-सा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की डींग नही हांकता, क्रोध से व्याकुल होने पर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्य को लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं।
जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु से बुद्धि पूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है।
जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कार्य, प्रायश्चित तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार-इन कार्यो को नित्य करता है, देवगण उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं।
जो दुसरो के धन, सौन्दर्य, बल, कुल, सुख, सौभाग्य व सम्मान से ईष्या करते हैं, वे सदैव दुखी रहते हैं।
जो धातु बिना गर्म किये मुड जाती है, उसे आग में नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकाने का प्रयत्न नहीं करता, अतः बुद्धिमान पुरुष को अधिक बलवान के सामने झुक जाना चाहिये।
जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समय पर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।
जो निर्भीक होकर बात करता है, कई विषयों पर अच्छे से बात कर सकता है, तर्क-वितर्क में कुशल है, प्रतिभाशाली है और शास्त्रों में लिखे गए बातों को शीघ्रता से समझ सकता है वही पण्डित कहलाता है।
जो पुरुष अच्छे कर्मों और पुरुषों में विश्वास नहीं रखता, गुरुजनों में भी स्वभाव से ही शंकित रहता है। किसी का विश्वास नहीं करता, मित्रों का परित्याग करता है, वह पुरुष निश्चय ही अधर्मी होता है।
जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी इठलाता नहीं चलता, वह पंडित कहलाता है।
जो विश्वास का पात्र नहीं है उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिये पर जो विश्वास योग्य है उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिये। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
जो व्यक्ति किसी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, उस विषय के बारे में धैर्य पूर्वक सुनते हैं, और अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से संपन्न करते हैं, तथा किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करते हैं वही पण्डित कहलाते हैं।
जो व्यक्ति किसी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, उस विषय के बारे में धैर्य पूर्वक सुनते हैं, और अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से संपन्न करते हैं, तथा किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करते हैं। वही पण्डित हैं
जो व्यक्ति पहले निश्चय करके रूप रेखा बनाकर काम को शुरू करता है तथा काम के बीच में कभी नहीं रुकता और समय को नहीं गँवाता और अपने मन को वश में किये रखता है वही पण्डित कहलाता है।
जो व्यक्ति प्रकृति के सभी पदार्थों का वास्तविक ज्ञान रखता है, सब कार्यों के करने का उचित ढंग जानने वाला है तथा मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ उपायों का जानकार है वही मनुष्य पण्डित कहलाता है।
जो स्वार्थ तथा अधिक पा लेने की हवस से मुक्त हैं, मैं उन्हें समझदार मानता हूँ क्योंकि संसार में स्वार्थ और हवस ही सारे झंझटों के कारण होते हैं।
देवगण ऐसे व्यक्तियों के साथ होते हैं-जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कार्य, प्रायश्चित तथा अनेक प्रकार के लौकिक आचार – इन कार्यो को नित्य करता है, देवगण उसके अभ्युदय की सिद्धि करते हैं।
जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु से बुद्धि पूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वही धीर है।
निम्न छः प्रकार के मनुष्य सदा दुखी रहते हैं-ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन-निर्वाह करने वाला – ये सदा दुखी रहते हैं।
बुद्धिमान तथा ज्ञानी लोग दुर्लभ वस्तुओं की कामना नहीं रखते, न ही खोयी हुए वस्तु के विषय में शोक करना चाहते हैं तथा विपत्ति की घडी में भी घबराते नहीं हैं।
निम्न दस प्रकार के लोग धर्म को नहीं जानते-नशे में मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी। विद्वान व्यक्ति इन लोगों से आसक्ति न बढ़ाये।
नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेश में न रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल रखना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निडर होकर रहना-ये छः मनुष्य लोक के सुख हैं।
पर-स्त्री का स्पर्श, पर-धन का हरण, मित्रों का त्याग रूप यह तीनों दोष क्रमशः काम, लोभ, और क्रोध से उत्पन्न होते हैं।
बिल में रहने वाले जीवों को जैसे सांप खा जाता है, उसी प्रकार शत्रु से डटकर मुकाबला न करने वाले शासक और परदेश न जाने वाले ब्राह्मण – इन दोनों को पृथ्वी खा जाती है।
बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-निग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता – ये आठ गुण पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।
बुद्धिमान पुरुष शक्ति के अनुसार काम करने के इच्छा रखते हैं और उसे पूरा भी करते हैं तथा किसी वस्तु को तुक्ष्य समझ कर उसकी अवहेलना नहीं करते हैं।
बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाए तो चैन से न बैठे, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
पिता, माता अग्नि, आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए। Vidur Niti Hindi:
मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य को जो वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की तो बात ही क्या है। Vidur Niti Hindi:
मन, वचन और कर्म से मनुष्य जिस विषय का बार – बार ध्यान करता है, वही उसे अपनी और आकर्षित कर लेता है, अत: सदैव अच्छे कर्म ही करने चाहिए। Vidur Niti Hindi:
मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
मनुष्य को कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्ति का अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए। Vidur Niti Hindi:
मनुष्य जैसे लोगों के बीच उठता-बैठता है, जैसो की सेवा करता है तथा जैसा बनने की कमाना करता है, वैसा ही बन जाता है।
मित्रों से समागम, अधिक धन की प्राप्ति, पुत्र का आलिंगन, मैथुन में प्रवृत्ति, समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्ग के लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति और समाज में सम्मान – ये आठ हर्ष के सार दिखाई देते हैं और ये ही लौकिक सुख के साधन भी होते हैं।
मीठे शब्दों से कही गई बात अनेक तरह से कल्याण करती है, लेकिन कटु शब्दों में कही गई बात अनर्थ का कारण बन जाती है। Vidur Niti Hindi:
मुर्ख की यह प्रव्रत्ति है कि वह सदैव उन लोगों का अपमान करता है जो विद्या, शील, आयु। बुद्धि, धन और कुल में श्रेष्ट हैं तथा माननीय हैं। Vidur Niti Hindi:
मूर्ख लोगो के लक्षण :- 1. बिना ज्ञान के ही धमंड में चूर रहने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मंसूबे बांधने वाले, और बिना परिश्रम के ही धनवान बनने की इच्छा रखने वाले।
2. जो अपना काम छोड़कर, दूसरों के कर्त्तव्य पालन में लगा रहता है तथा मित्रों के साथ गलत कार्यों में संलग्न रहता है।
3. जो न चाहने वाली चीजों की इच्छा करता है, और चाहने वाली चीजों से मुह फेर लेता है, और अपने से शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी मोल लेता है।
4. जो शत्रु को मित्र बनाता है, और मित्र से ईर्ष्या करता है तथा हमेशा बुरे कर्मों ही करता है।
5. जो अपने कार्यों के भेद खोल देता है, और हर चीज में शक करता है, और जिन कार्यों को करने में कम समय लेना चाहिए उन्हें करने में अत्यधिक समय लगाता है।
6. जो पितरों का श्राद्ध नहीं करता है और न ही देवताओं की पूजा करता है, और न ही अच्छे लोगों से दोस्ती करता है।
7. जो बिन बुलाये ही किसी स्थान पर पहुँच जाता है और बिना पूछे ही बोलता है तथा अविश्वसनीय लोगों पर भी विश्वास करता है।
8. जो स्वयं गलती करके भी आरोप दूसरों पर मढ़ देता है, और असमर्थ होते हुए भी क्रोधित हो जाता है।
9. जो अपनी ताकतों और क्षमताओं को न पहचानते हुए भी धर्म और लाभ के विपरीत जाकर न पा सकने वाली वस्तु की कामना करता है।
10. जो किसी को अकारण ही दंड देता है और अज्ञानियों के प्रति श्रद्धा से भरा रहता है तथा कंजूसों का आश्रय लेता है। Vidur Niti Hindi:
मूढ़ चित्त वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाये ही अंदर चला आता है, बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वाश करने योग्य नहीं हैं उन पर भी विश्वाश कर लेता है।
ये दो आदतें नुकीले कांटे की तरह शरीर को बेध देती है: गरीब होकर भी कीमती वस्तुओं की इच्छा रखना, कमजोर होकर भी गुस्सा करना।
ये दो प्रकार के पुरुष सूर्यमंडल को भी भेद कर सर्वोच्च गति को प्राप्त करते हैं :- योगयुक्त सन्यासी, वीरगति को प्राप्त योद्धा।
ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाते हैं :- शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला, गरीब होकर भी दान करने वाला।
ये लोग धर्म नहीं जानते : नशे में धूत, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लालची, डरा हुआ व्यक्ति और कामी।
व्यक्ति चाहे अच्छे कुल में जन्मा हो अथवा निक्रष्ट कुल में – जो मर्यादा का पालन करता है, धर्मानुसार कार्य करता है, जिसका स्वभाव कोमल है, जो लज्जाशील है, वह सैकड़ो कुलीनों से श्रेष्ठ है
सत्य से धर्म की रक्षा होती है, योग से विद्या सुरक्षित होती है, सफाई से सुन्दर रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है, तोलने से अनाज की रक्षा होती है, हाथ फेरने से घोड़े सुरक्षित रहते हैं, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की तथा मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है।
सही तरह से कमाए गए धन के दो ही दुरुपयोग हो सकते हैं :- अपात्र को दिया जाना, सत्पात्र को न दिया जाना
ज्ञानी पुरुष हमेशा श्रेष्ठ कर्मों में रूचि रखते हैं, और उन्न्नती के लिए कार्य करते व् प्रयासरत रहते हैं तथा भलाई करनेवालों में अवगुण नहीं निकालते हैं।
निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते। अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम्।। अर्थ: जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है, उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
न ह्रश्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते। गंगो ह्रद इवाक्षोभ्यो य: स पंडित उच्यते।। अर्थ: जो अपना आदर-सम्मान होने पर ख़ुशी से फूल नहीं उठता, और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगाजी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।।
अनाहूत: प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते। अविश्वस्ते विश्वसिति मूढ़चेता नराधम: ।। अर्थ: मूढ़ चित्त वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाये ही अंदर चला आता है, बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वाश करने योग्य नहीं हैं उनपर भी विश्वाश कर लेता है।
अर्थम् महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा। विचरत्यसमुन्नद्धो य: स पंडित उच्यते।। अर्थ: जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी इठलाता नहीं चलता, वह पंडित कहलाता है।
एक: पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजन: । भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते।। अर्थ: मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं; पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता। बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्रम सराजकम्।। अर्थ: किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है किसी एक को भी मारे या न मारे। मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।।
एकमेवाद्वितीयम तद् यद् राजन्नावबुध्यसे। सत्यम स्वर्गस्य सोपानम् पारवारस्य नैरिव।। अर्थ: विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं : राजन ! जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, कुछ और नहीं, किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
एको धर्म: परम श्रेय: क्षमैका शान्तिरुक्तमा। विद्वैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा।। अर्थ: केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
अहिंसा ही सुख देने वाली है। द्वाविमौ पुरुषौ राजन स्वर्गस्योपरि तिष्ठत: । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।। अर्थ: विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं : राजन ! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं – शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देनेवाला ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम नाशनमात्मन: । काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।। अर्थ: काम, क्रोध, और लोभ – ये आत्मा का नाश करने वाले नरक के तीन दरवाजे हैं, अतः इन तीनो को त्याग देना चाहिए।
पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ।। अर्थ: भरतश्रेष्ठ ! पिता, माता अग्नि,आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।
षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छिता। निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।। अर्थ: ऐश्वर्य या उन्नति चाहने वाले पुरुषों को नींद, तन्द्रा (उंघना ), डर, क्रोध,आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (जल्दी हो जाने वाले कामों में अधिक समय लगाने की आदत )- इन छ: दुर्गुणों को त्याग देना चाहिए।
षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन। सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः।। अर्थ: मनुष्य को कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणों में दोष दिखाने की प्रवृत्तिका अभाव ), क्षमा तथा धैर्य – इन छः गुणों का त्याग नहीं करना चाहिए।
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योधिगच्छति। न स पापैः कुतो नर्थैंर्युज्यते विजेतेँद्रियः।। अर्थ: मन में नित्य रहने वाले छः शत्रु – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य को जो वश में कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापों से ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होने वाले अनर्थों की बात ही क्या है।
ईर्ष्यी घृणी न संतुष्टः क्रोधनो नित्याशङ्कितः। परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुः खिताः।। अर्थ: ईर्ष्या करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संकित रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन-निर्वाह करने वाला – ये छः सदा दुखी रहते हैं।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च। पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च।। अर्थ: बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता – ये आठ गन पुरुष की ख्याति बढ़ा देते हैं।
प्राप्यापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सप्तनाः।। अर्थ: जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समय पर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं।
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पौरुषेणापि विकत्थतेन्यान। न मूर्छित: कटुकान्याह किञ्चित् प्रियं सदा तं कुरुते जानो हि।। अर्थ: जो कभी उद्यंडका-सा वेष नहीं बनाता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम की डींग नही हांकता, क्रोध से व्याकुल होने पर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्य को लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं।
अनुबंधानपक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु। सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्। अर्थ: किसी प्रयोजन से किये गए कर्मों में पहले प्रयोजन को समझ लेना चाहिए। खूब सोच-विचार कर काम करना चाहिए, जल्दबाजी से किसी काम का आरम्भ नहीं करना चाहिए।
भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्। लोभाभिपाती ग्रस्ते नानुबन्धमवेक्षते।। अर्थ: मछली बढ़िया चारे से ढकी हुई लोहे की कांटी को लोभ में पड़कर निगल जाती है, उससे होने वाले परिणाम पर विचार नहीं करती।
सुखी जीवन के सूत्र : दोस्तों से मेलजोल, ज्यादा धन कमाना, पुत्र का आलिंगन, मैथुन में प्रवृत्ति, सही समय पर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्ग के लोगों में उन्नति, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति और समाज में सम्मान.

Sampurna vidur niti: विदुर कौन थे,विदुर की जीवनी,विदुर का अर्थ,विदुर कथा क्या है?

‘महाभारत’ की कथा के महत्त्वपूर्ण पात्र विदुर कौरव-वंश की गाथा में अपना विशेष स्थान रखते हैं। और विदुर नीति जीवन-युद्ध की नीति ही नहीं, जीवन-प्रेम, जीवन-व्यवहार की नीति के रूप में अपना विशेष स्थान रखती है। राज्य-व्यवस्था, व्यवहार और दिशा निर्देशक सिद्धांत वाक्यों को विस्तार से प्रस्तावना करने वाली नीतियों में जहां चाणक्य नीति का नामोल्लेख होता है, वहां सत्-असत् का स्पष्ट निर्देश और विवेचन की दृष्टि से विदुर-नीति का विशेष महत्त्व है। व्यक्ति वैयक्तिक अपेक्षाओं से जुड़कर अनेक बार नितान्त व्यक्तिगत, एकेंद्रीय और स्वार्थी हो जाता है, वहीं वह वैक्तिक अपेक्षाओं के दायरे से बाहर आकर एक को अनेक के साथ तोड़कर, सत्-असत् का विचार करते हुए समष्टिगत भाव से समाज केंद्रीय या बहुकेंद्रीय होकर परार्थी हो जाता है।

 ‘स्व’ का ‘पर’ विस्तार रही सत्य में मनुष्य धर्म का प्रमुखतः अपेक्षित पक्ष होता है। चाणक्य ने इसे स्पष्टतया समाज धर्म के आलोक में देख-परख कर प्रस्तुत किया है और विदुर ने अपने समय के संदर्भ में न्यायसंगत पक्षधरता के साथ निर्भय होकर व्यक्त किया है। चाणक्य निर्णायक स्थिति में व्याख्याता थे, जब कि विदुर अपनी वैयक्तिक-स्थितिगत सीमाओं से परिचित, परिचालित विनम्र निवेदन के रूप में प्रस्तावना करते हैं। चाणक्य में निर्देश एवं आदेश का भाव है, जबकि विदुर अपने विचार सत् परामर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

विदुर एक तरह से हस्तिनापुर राज-परिवार का सदस्य होकर ही दासी पुत्र के नाते अधिकार-रूप में कुछ भी कह पाने की दशा में नहीं थे। यह तो राजपरिवार का अनुग्रह और विदुर का तटस्थ सत्य स्थापन, ज्ञान और धर्म में रुचि का प्रभाव था कि सामान्य होकर भी उन्हें विशिष्ट रूप में उन्हें सदैव सम्मान मिला। भीष्म, माता सत्यवती, धृतराष्ट्र अपने जीवनकाल तक पाण्डु, युधिष्ठिर आदि भाई, कृष

Sampurna vidur niti: महात्मा विदुर की विदुर निति ग्रंथ की रचना कैसे हुयी?

हिन्दू ग्रंथों में दिये जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों ने महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है। विदुर जानते थे, युद्ध विनाशकारी होगा। महाराज धृतराष्ट्र अपने पुत्र (दुर्योधन) मोह में समस्या का कोई सरल समाधान नहीं खोज पा रहे थे। वह अनिर्णय की स्थिति में थे। दुर्योधन अपनी हठ पर अड़ा था। 

दुर्योधन की हठ-नीति विरुद्ध थी। पाण्डवों ने द्यूत की शर्त के अनुसार बारह वर्ष के बनवास और एक वर्ष की अज्ञातवास अवधि पूर्ण करने का बाद जब अपना राज्य वापिस माँगा तो दुर्योधन के हठ के सम्मुख असहाय एवं पुत्र मोह से ग्रस्त महाराज धृतराष्ट्र के पाण्डवों के दूत कोई निर्णायक उत्तर नहीं दे सके। केवल इतना आश्वस्त किया कि वह सबसे परामर्श करके संजय द्वारा अपना निर्णय प्रेषित कर देंगे। संजय के माध्यम से भेजा गया संदेश भी कोई निर्णायक संदेश नहीं था। उसमें इतना कहा गया था कि वे ऐसा कार्य करें जिससे भरतवंशियों का हित हो और युद्ध न हो।

‘महाभारत’ की कथा के महत्त्वपूर्ण पात्र विदुर कौरव-वंश की गाथा में अपना विशेष स्थान रखते हैं। और विदुर नीति जीवन-युद्ध की नीति ही नहीं, जीवन-प्रेम, जीवन-व्यवहार की नीति के रूप में अपना विशेष स्थान रखती है।

 राज्य-व्यवस्था, व्यवहार और दिशा निर्देशक सिद्धांत वाक्यों को विस्तार से प्रस्तावना करने वाली नीतियों में जहां चाणक्य नीति का नामोल्लेख होता है, वहां सत्-असत् का स्पष्ट निर्देश और विवेचन की दृष्टि से विदुर-नीति का विशेष महत्त्व है। व्यक्ति वैयक्तिक अपेक्षाओं से जुड़कर अनेक बार नितान्त व्यक्तिगत, एकेंद्रीय और स्वार्थी हो जाता है, वहीं वह वैक्तिक अपेक्षाओ

Sampurna vidur niti: विदुर के अनमोल वचन,विदुर नीति इन हिंदी Sampurna vidur niti: विदुर के अनमोल वचन,विदुर नीति इन हिंदी Reviewed by Admin on March 26, 2018 Rating: 5

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